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©️संदीप कुमार तिवारी 'श्रेयस', छंद मुक्त कविता

जीवन का सार

जीवन का सार ही यहीं है।जीवन में सार ही नहीं है।जिसे जीतने का सौक नहीं,उसकी कोई हार ही नहीं है। […]

©️संदीप कुमार तिवारी 'श्रेयस', छंद मुक्त कविता

टूटा बंधन

सूखे बेल के पत्ते कभी वृक्ष नहीं हरा करते।सरोवर अपने पानी से सागर नहीं भरा करते।व्यक्ति से व्यक्ति की गरिमा

©️संदीप कुमार तिवारी 'श्रेयस', छंद मुक्त कविता

मैं हर रात चैन से सोता हूँ

कदाचित हो संभव तेरे बगैर मैं जी सकूतो होगी ज़िंदगी पर ज़िंदगी में मैं नहीं।तुम्हे क्या खबर कि कितने सागर

©️संदीप कुमार तिवारी 'श्रेयस', ग़ज़ल

किसी की भी वफ़ा मुझको नहीं लगती।

  सुनो यारो कि क्या  मुझको नहीं लगती।किसी की भी वफ़ा मुझको नहीं लगती। मुझे   बीमार  तू  कर  तो  गया 

©️संदीप कुमार तिवारी 'श्रेयस', ग़ज़ल

सभी होश में हैं मगर मैं नहीं।

  सभी   होश   में   हैं  मगर  मैं  नहीं।उधर  तुम  नहीं  हो  इधर  मैं  नहीं। तिरे  इश्क़  में  ये  किधर  खो 

©️संदीप कुमार तिवारी 'श्रेयस', ग़ज़ल

किसी का ईश्क़ किसी का ख़ता नहीं होता।

   जिसे भी  होता है  उसको  पता  नहीं होता। किसी का ईश्क़ किसी का ख़ता नहीं होता।  हिसाब रखता है बहुत

©️संदीप कुमार तिवारी 'श्रेयस', छंद मुक्त कविता

कहीं किसी में जी लेता हूँ

वर्षों ह्रदय में पीर रहे हैंअभी तो नैन से नीर बहे हैंसोता जग जब मैं जगता हूँखुद को बोझ सा

©️संदीप कुमार तिवारी 'श्रेयस', छंद मुक्त कविता

कैसा फूल खिला उपवन में

लिये इसके बहार नहीं हैकाँटों को भी प्यार नहीं हैजब देखो आ जाता सिंधु,खाली-खाली इन नैनन में।कैसा फूल खिला उपवन

©️संदीप कुमार तिवारी 'श्रेयस', ग़ज़ल

मुमकिन नहीं है आदमी ऐ यार ग़म को बांट दे।

  जो कुछ मिला है प्यार में  कहता  है हम को बांट दे। मुमकिन  नहीं  है आदमी  ऐ  यार  ग़म 

©️संदीप कुमार तिवारी 'श्रेयस', ग़ज़ल

एक कमरे में कर ले बसर।

  एक   कमरे  में  कर  ले  बसर। और   फिर  तू  उधर  मैं  इधर।   बा-वफ़ा  गम   भी   तू  खूब  है,

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