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सजल

जिस्म तन्हा है रूह प्यासी है।

जिस्म   तन्हा  है  रूह  प्यासी  है।जिंदगी   में    यूँ   बदहवासी    है। जा   रहा   है   क्या   खाए  मुझको,याद   है    […]

सजल

हर शै से रूठा करते हैं हर ‘शै’ में बगावत लगती है।

जब से  हम उनसे  बिछड़े हैं  ज़िंदगी शरारत  लगती है।हर शै से रूठा करते  हैं हर ‘शै’  में  बगावत  लगती 

सजल

जिंदा रहने को मगर और बहाना क्या है।

  तेरी  उलफ़त  में  सनम  उम्र  गवाना  क्या  है।जिंदा  रहने  को   मगर  और  बहाना  क्या  है। तूं मेरी जां है

सजल

यूँ दिल की दुनिया में आ के कभी वैसे कभी न जाता है कोई,

यूँ दिल की दुनिया में आ के कभी वैसे कभी न जाता है कोई,वो तो भूल गया है जैसे कि

सजल

कहाँ किसी का जमाने में यार होता है।

  कहाँ  किसी  पे  कभी  ऐतबार  होता  है।कहाँ  किसी  का जमाने  में यार  होता है। वो शौक या  है  जरूरत 

सजल

बहुत ठोकर अब खा चुका हूँ मैं।

  सुना है  सबको  भा  चुका  हूँ मैं।बहुत ठोकर अब खा चुका हूँ मैं। उडा करता था  आसमां  में पर,जमीं

सजल

हम अपने होने ‘का’ दम भरते हैं।

दिल में गर्दिश-ए-चमन भरते हैं।हम अपने होने ‘का’ दम भरते हैं। खुश रह लेंगे आज दुःख है तो कल,हर दिन

सजल

अब वो शख़्स मुड़ के कभी भी इक नज़र नहीं देखता।

मिलता   है  मुझे   और  फिर  मेरे  इधर  नहीं  देखता।अब वो शख़्स मुड़ के कभी भी इक नज़र नहीं देखता। मसला

शायरी संग्रह, सजल

आजाद अश’आर

कि जो इंसाफ़ से नहीं  मिलता। किसी के बाप  से नहीं मिलता। त’अल्लुक़  ईश्क  का ज़माने में, मिरे  हालात  से 

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