
ग़ज़ल लिखना सीखे भाग -15
मुरक्कब मुज़ाहिफ़ बह्रें।
मुरक्कब मुज़ाहिफ़ बह्रें, मुरक्कब सालिम बह्र के ही उप बह्रे हैं।
दरअसल मुरक्कब सालिम बह्रों का प्रयोग हिंदी या उर्दू इन दोनो ग़ज़लों में बहुत कम या यूँ कहें कि ना मात्र ही होता है। इस लिए हम मुरक्कब सालिम बह्र को छोड़कर उसके उप बह्र की ही बात करेंगे।
तो दोस्तों जैसा कि हमने पिछले भाग में ही तक़्तीअ के कईं रूप को समझा लेकिन मैं यहाँ एक बात बता दूँ कि जिसने पिछले भाग यानी ग़ज़ल लिखना सीखें भाग-14 नहीं पढ़ा तो उन सभी से निवेदन है कि पहले पिछला भाग पढ़ ले ताकि आज का एपिसोड ठीक से समझ में आ सके। अब आईए समझते हैं मुरक्कब मुज़ाहिफ़ बह्रों को।
निम्नलिखित इक ग़ज़ल के उदाहरण से इसे समझते हैं👇
(घ) मुरक्कब मुज़ाहिफ़ बह्रें
ग़ज़ल (12) –
(2122 1212 22) ख़फ़ीफ़ की उप-बह्र।
दिले नादाँ तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है
हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार
या इलाही ये माज़रा क्या है
मैं भी मुँह में ज़बान रखता हूँ
काश पूछो कि मुद्दआ क्या है
हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है
मैंने माना कि कुछ नहीं ‘ग़ालिब’
मुफ़्त हाथ आए तो बुरा क्या है
~मिर्ज़ा ग़ालिब (महाकवि ग़ालिब पृष्ठ-55)
अब इसके तक़्तीअ को समझिए।
इस ग़ज़ल में आखिरी रुक्न को 22 के जगह छूट लेते हुए 112 किया गया है और उसके नीचे मात्रा को 112 लिखा गया है। साथ ही आपको बता दूँ कि इस बह्र में एक विशेष प्रकार का छूट लेते हुए पहले रुक्न की मात्रा 2122 को किसी भी मिसरे में गिरा कर 1122 हम उसे 1122 भी कर सकते हैं। यहाँ यह भी समझ लीजिए कि यह छूट मात्र दो बार ही मिलती है यानी आप किसी दो मिसरे में ही यह छूट ले सकते हैं लेकिन यहाँ यह जरूरी नहीं कि कोई निश्चित मिसरा इसके लिए तय किया गया है,आप यह छूट किसी भी मिसरे में ले सकते हैं।अब देखिए इसमें पहली बार का अर्कान 2122 1122 1122 22 है।
अब इस ग़ज़ल में देखे कि पहले रुक्न को ग़ज़ल में तक़्तीअ करते हुए 2122 को इसके स्थान पर जहाँ छूट अनुसार 1122 किया गया हैं वहाँ नीचे मात्रा को 1122 लिखा गया है। तक़्तीअ को ध्यान से देखे👇
दिले नादाँ / तुझे हुआ / क्या है
2122 /1212/22
आख़िर इस दर् / द की दवा / क्या है
2122 /1212/22
(आखिर इस को अलिफ़ वस्ल द्वारा आ/खि/रिस 212 माना गया है)
हम हैं मुश्ता / क़ और वो / बेज़ा र
2122/1212/22 +1
या इलाही / ये माज़रा / क्या है
2122 /1212/22
मैं भी मुँह में / ज़बान रख / ता हूँ
2122 /1212/22
काश पूछो / कि मुद्दआ / क्या है
2122 /1212/22
हमको उनसे / वफ़ा की है उम्मीद
2122/1212/22 +1
जो नहीं जा / नते वफ़ा / क्या है
2122 /1212/22
मैंने माना / कि कुछ नहीं / ग़ालिब
2122 /1212/22
मुफ़्त हाथ आ/-ए-तो बुरा / क्या है
2122 /1212/22
मुझे पता है अब आप लोगों को थोड़ी कठिनाई होती होगी समझने में लेकिन यहां इसे और विशेष नहीं किया जा सकता, हालांकि अधिक गौर किया जाए तो सब समझ में आ जाएगा।
आइए अब मुज़ारे की उप बह्र में इक ग़ज़ल और लेकर समझते हैं।
(1212/1122/1212/22) मुज़ारे की उप बह्र
कहीं पे सर कहीं खंजर हवा में उड़ते हैं
हमारे शहर में पत्थर हवा में उड़ते हैं
जिन्हें ज़मीं पे सलीक़ा नहीं है चलने का
कमाल-ए-फ़न हैं वो अक्सर हवा में उड़ते हैं
बसद खुलूस तराशे गये थे बुत जिनके
सदाक़तों के वो पैकर हवा में उड़ते हैं
~रहमत अमरोहवी (इज़ाफा, पृष्ठ-21)
अब इसके तक़्तीअ देखिए👇
कहीं पे सर / कहीं खंजर / हवा में उड़ / ते हैं
1212 /1122 /1212/22
हमारे शह / र में पत्थर / हवा में उड़ / ते हैं
1212 /1122 /1212/22
जिन्हें ज़मीं / पे सलीक़ा / नहीं है चल / ने का
1212 /1122/1212/22
कमाले फ़न / हैं वो अक्सर / हवा में उड़ / ते हैं
1212 /1122 1212/22 /
बसद खुलू / स तराशे / गये थे बुत / जिनके
1212 /1122 1212/22 /
सदाक़तों / के वो पैकर / हवा में उड़ / ते हैं
1212/1122 /1212/22
यहाँ तक आपलोगों ने समझा, अगर देखा जाए तो ग़ज़ल को समझना इतना आसान नहीं अब मैं चुकि औपचारिकता पे विश्वास नहीं करता इसलिए मैं यहाँ यह नहीं कह सकता कि इसे समझना बहुत आसान है; लेकिन प्यारे मित्रों आपने यह जरूर पढ़ा होगा कि कोशिश करनेवालों की हार नहीं होती।
पढ़ते रहिए कोशिश करते रहिए इतना तो पक्का तय है कि एक न एक दिन आप जरूर लिख सकते हो।
आदमी जो चाहे कर सकता है बस वो काम करने की उसके पास बेशुमार दिवानगी होनी चाहिए।
आज इतना ही,फिर मिलते हैं अगले एपिसोड में तब तक के लिए जय हिंद।