मुसाफ़िर चलते जाना रे

साँस-साँस पे घुटन लिखा है
बात-बात पे हार
यही जगत की रीत है भईया
कर ले तू स्वीकार
ठोकर खा खा के है तुमको आगे कदम बढ़ाना रे
मुसाफ़िर चलते जाना रे…..4

मांगने से क्या तुम्हें मिला है जो भी मिला सब भाग्य है तेरा
दो दिन का ये जीवन तेरा दो दिन का ये रैन बसेरा
नैनों से नदियाँ बहती हैं तो भी चलेगा जीवन तेरा
आँगन में खुशियाँ रहती हैं तो भी चलेगा जीवन तेरा
अजर-अमर बनके रहने का यहाँ नहीं है ठिकाना रे
मुसाफ़िर चलते जाना रे…..4

सूरज कब मिलता साया से चाँद से कब यहाँ मिली चकोरी
किसी की इच्छा हुई न पूरी रह गयी सबकी थोड़ी थोड़ी
प्रेमी प्यार की प्यासी नदिया प्यासी ही रह जाती है
यही सत्य है ज्ञात भी तुमको फिर काहे की उदासी है
अपने दिल को समझा ले तू क्या जग को समझाना रे
मुसाफ़िर चलते जाना रे….4

राह में तेरे शूल मिलेंगे कहीं दूर फिर फूल मिलेंगे
नहीं ज़रूरी कि हर पग पे रस्ते सब अनुकूल मिलेंगे
कहीं नींद आए पत्थर पर कहीं गद्दे पे रोना होगा
कुछ भी कर लो अंत समय में लकड़ी सिर्फ बिछौना होगा
खाली हाथ ही आँख मूंद के है एक दिन सो जाना रे
मुसाफ़िर चलते जाना रे….4

साँस-साँस पे घुटन लिखा है
बात-बात पे हार
यही जगत की रीत है भईया
कर ले तू स्वीकार
ठोकर खा खा के है तुमको आगे कदम बढ़ाना रे
मुसाफ़िर चलते जाना रे…..4

©️ संदीप कुमार तिवारी ‘बेघर’

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