ग़ज़ल लिखना सीखें

जैसा कि आप सभी को पता है, ग़ज़ल लिखना सीखे भाग- 13 में हम ग़ज़ल की तक़्तीअ के बारे में चर्चा कर रहे थे,
अगर किसी का इससे पहले का भाग छूट गया हो तो कृप्या ग़ज़ल लिखना सीखे भाग-13 जरूर पढ़ ले ताकि आप सभी को ये वाला भाग समझ में आ जाए।
चलिए अब आगे बढ़ते हैं।
चलिए और कुछ तक़्तीअ देखते हैं
विनस केसरी जी के द्वारा लिए गए इक ग़ज़ल उदाहरण स्वरूप समझते हैं👇

ग़ज़ल

बहर-ए-कामिल की सालिम सूरत (11212 / 11212 / 11212/ 11212)

 

मुझे अपनी पस्ती की शर्म है, तेरी रिफ़्अतों का ख्याल है
मगर अपने दिल का मैं क्या करूँ इसे फिर भी शौके-विसाल है

 

वो ख़ुशी नहीं है वो दिल नहीं, मगर उनका साया सा हमनशीं

फकत एक ग़मज़दा याद है फक़त इक फ़सुर्दा ख्याल है

 

        ~अख्तर शीरानी, पृष्ठ-51

तक़्तीअ (3) –

मुझे अपनी पस् /ती की शर्म है/तेरी रिफ़अतों/का ख्याल है

11212 / 11212 /11212 /11212
मगर अपने दिल/का मैं क्या करूं/इसे फिर भी शौ/के-विसाल है
11212 / 11212 /11212 /11212
(मगर अपने को अलिफ़ वस्ल द्वारा म/गु/रप/ने 1121 गिना गया है) /

वो खुशी नहीं/है वो दिल नहीं,/मगर उनका सा/या सा हमनशीं
11212 /11212 /11212 /11212
(मगर उनका को अलिफ़ वस्ल द्वारा म/गु/रुन/का 1121 गिना गया है)
फ़क़त एक ग़म/ज़दा याद है/फकत इक फ़सु/र्दा ख्याल है
11212 /11212 /11212 /11212

मैं आप सभी को फिर से बता दू कि पिछले भाग को बिना पढ़े यह बिलकुल समझ नहीं आनेवाला है।
अब आगे इसे मुफ्रद मुज़ाहिफ़ बह्र के अनुसार हम इसे देखेंगे।

 

ग़ज़ल 👇

 

बहर-ए-रमल की मुज़ाहिफ़ सूरत (2122 / 2122/212)

 

सिर्फ अश्कों को परेशानी रही
ग़म बयाँ करने में आसानी रही

 

 

ज़िंदगी भर अक़्ल के हामी रहे
अब समझते हैं कि नादानी रही

 

 

रफ़्ता-रफ़्ता खुद के आदी हो गये
कुछ दिनों तक तो परेशानी रही

 

            ~मनीष शुक्ला (ख्वाब पत्थर हो गया, पृष्ठ -3)

 

तक़्तीअ समझिए👇

सिर्फ अश्कों / को परेशा / नी रही
2122/2122 /212
ग़म बयाँ कर / ने में आ सा / नी रही
2122 /2122 /212
ज़िंदगी भर / अक्ल के हा / मी रहे
2122 / 2122 /212
अब समझते / हैं कि नादा / नी रही
2122/2122 /212
रफ्ता-रफ्ता / ख़ुद के आदी / हो गये
2122 / 2122 /212
कुछ दिनों तक / तो परेशानी / रही
2122/2122 /212

 

एक और उदाहरण ले के इसे समझते हैं वैसे तो ग़ज़ल की बाबत(ग्रामर/व्याकरण)को जितना अधिक समझा जाए उतना ही कम है लेकिन मेरी कोशिश रहेगी कि कुछ बेसिक जानकारी आपको उतनी जरूर दे दें जितना में यह आपको समझ में आ सके।
अब आईए बह्र-ए-हज़ज की मुजाहिफ़ सूरत के अनुसार तक़्तीअ करे।

 

बहर-ए-हज़ज की मुज़ाहिफ़ सूरत (1222 / 1222/122)

ग़ज़ल👇

चराग़ों को उछाला जा रहा है
हवा पर रौब डाला जा रहा है

 

 

न हार अपनी न अपनी जीत होगी
मगर सिक्का उछाला जा रहा है

 

 

जनाज़े पर मेरे लिख देना यारों
मुहब्बत करने वाला जा रहा है

-राहत इन्दौरी (चाँद पागल है, पृष्ठ – 24)

 

तक़्तीअ👇

चराग़ों को / उछाला जा / रहा है
1222/1222 /122
हवा पर रौ / ब डाला जा/ रहा है
1222 /1222 /122
न हार अपनी/न अपनी जी/त होगी
1222 /1222 /122
(हार अपनी को अलिफ़ वस्ल द्वारा हा/रप/नी 222 गिना गया है)
मगर सिक्का/उछाला जा/रहा है
1222 /1222 /122
जनाज़े पर/मेरे लिख दे/ना यारों
1222 /1222 /122
मुहब्बत कर/ने वाला जा/रहा है

 

 

ग़ज़लों में जो नियम बनाए गयें हैं उनको देखते हुए ऐसे शायर भी हुए जिन्होंने बिना किसी नियम के शे’र लिखे फिर भी उसे तवज्जो दिया गया।
ऐसे शायरों में एक दौर में दुष्यंत जी बहुत प्रचलित रहे। फिर भी जब उनके शे’र को पढ़ा जाता तो काफी हद तक वो ग़ज़ल की तरह हीं लगती थी तो उसे भी ग़ज़ल का दर्जा मिला;
लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उनकी सारी ग़ज़लें ऐसी ही होती थीं,यह ध्यान रखने की बात है कि यह बात सिर्फ एक अलोचा तक ही सीमित है जो उस दौर के आलोचकों के द्वारा कही गयी थी।
आइए एक और देखते हैं।
बह्र-ए-रमल की मुज़ाहिफ़ सूरत के अनुसार इक ग़ज़ल और देखे तक़्तीअ के साथ।

 

ग़ज़ल

 

बहर-ए-रमल की मुज़ाहिफ़ सूरत 

(2122/1122/1122/22)

रंग उड़ता हुआ बिखरे हुए गेसू तेरे
हाय वो रात कि थमते न थे आँसू तेरे

 

 

अगले वक़्तों की सी तहज़ीब है पहनावे में
फिर भी सौ तरह से बोल उठते हैं जादू तेरे

 

 

कुछ बता पैकर-ए-तक़दीस-ए-हया,
सुबह-ए-अज़ल किन बहानों से तराशे गये पहलू तेरे

 

~शाज़ तमकनत [आवाज़ चली आती है, पृष्ठ – 3]

 

तक़्तीअ देखिए👇

रंग उड़ता / हुआ बिखरे / हुए गेसू / तेरे
2122/1122 /1122/22
हाय वो रा/त कि थमते/न थे आँसू /तेरे
2122/1122 /1122/22
अगले वक्तों/की सी तहज़ी/ब है पहना/वे में
2122/1122 /1122/22
फिर भी सौ तर/ह से बोल उठ/ते हैं जादू /तेरे
2122 /1122 /1122/22
(मिसरे में तरह 12 को तह 21 वज़्न पर बाँधा गया है जो कि उचित है) 

(बोल उठते को अलिफ़ वसल द्वारा बो/लुठ/ते 221 गिना गया है)
कुछ बता पै/करे तक़दी/से हया सुब/हे अज़ल
2122 /1122/1122 /112
किन बहानों / से तराशे / गये पहलू / तेरे
2122 /1122/1122/22

 

 

जैसे कि आपने देखा कि ऊपर लिखे शे’र के मिस्रा-ए-ऊला में बहुत खूबसूरती से बिना मात्रा गिराए इस कठिन बह्र को कितने अच्छे से निभाया गया है।
आज इतना ही,मिलते हैं फिर अगले भाग में।
धन्यवाद🙏

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