
तक़्तीअ
ऊपर लिखा गया शब्द से आपको लगा होगा यह ग़ज़ल की तक़्तीअ के बारे में हैं तो ऐसा बिलकुल नहीं। ग़ज़ल की तक़्तीअ कैसे की जाती है ये हम पहले ही पढ़ चुके हैं।
यहाँ इस लेख में तक़्तीअ के द्वारा मात्रा गणना के कुछ व्यवहारिक पक्षों पे हम बात करेंगे।
तो दोस्तों आगे बढ़ने से पहले मैं यहीं कहना चाहूँगा कि अगर आपने हमारा इससे पहलेवाला भाग यानी ग़ज़ल लिखना सीखे भाग-12 नहीं पढ़ा हो तो जरूर पढ़ ले ताकि आज का भाग आप सभी को अच्छे से समझ में आ जाए।
तो चलिए पोस्ट में आगे बढ़ते हैं।
वैसे हम तक़्तीअ के अनुसार ग़ज़ल की व्याख़्या पहले ही कर चुके हैं लेकिन आइए इसे अब विस्तार पूर्वक देखते हैं।
तक़्तीअ में बह्र भेद के अनुसार जो ग़ज़लें कही जाती हैं उनका वर्गीकरण अलग-अलग भागों में किया गया हैं। जैसे- (क)मुफ्रद सालिम,(ख)मुफ़्रद मुज़ाहिफ़,(ग)मुरक्कब सालिम,(घ)मुरक्कब मुज़ाहिफ़,(च)मात्रिक बह्र।
एक बात ख़याल रहे कि कुछ बह्रें ऐसी भी होती हैं जिनमें कुछ विशेष छूट दी जाती हैं। पहले हम यह समझ ले कि ग़ज़लों में मुख्य छूट जो मिलती हैं वो क्या हैं।
पहला छूट तो ये जो कि सबसे प्रचलित है वो यह है कि सभी बह्रों में हम अर्कान के अंत में एक अतिरिक्त लघु ले सकते हैं जैसे मान ले कि एक बह्र है-2122/2122/2121/2122
इसे हम ग़ज़ल में मिलने वाले विशेष छूट के कारण 2122/2122/2121/2122+1 भी कर सकते हैं। एक बात और मैं आपको बता दूँ कि इस छूट को एक बार यदि आप एक मिस्रे में ले लिए तो इसे आप हर मिस्रे में भी दूहरा सकते हैं इसमें कोई बाध्यता नहीं है और हर मिस्रे में लेना कोई जरूरी भी नहीं आप अपने सुविधा के अनुसार इसे घटा या बढ़ा सकते हैं।
अब चलिए तक़्तीअ को समझते हैं।
जहाँ मात्रा गिराई गयी हैं उसे हमने कोष्ठ में कर दिया है और जिस मिस्रे में अतिरिक्त लघु(1) मात्रा लिया गया है उसके अंत में हमने +1 लिखा है जैसा कि विनस केसरी जी कुछ ग़ज़लों के माध्यम से समझाते हैं।
(क) मुफ्रद सालिम बहरें.
ग़ज़ल (1)
बहर-ए-मुतक़ारिब की सालिम सूरत (122/122/122/122)
फिरे राह से वो यहाँ आते-आते
अज़ल मर गई तू कहाँ आते-आते
मुझे याद करने से ये मुद्दआ था
निकल जाए दम हिचकियाँ आते-आते
~दाग़ देहलवी (मैकदा सलाम करे,)
तक़्तीअ
फिरे रा/ ह से वो / यहाँ आ/(ते) आते
अज़ल मर/ गई तू/कहाँ आ/(ते) आते
122 /122/122/122
मुझे या/द करने/(से) ये मुद्/ दआ था
निकल जा/ए दम हिच/कियाँ आ/(ते) आते
122 /122 /122 /122
ग़ज़ल (2)-
बहर-ए-हजज की सालिम सूरत (1222/1222/1222/1222)
बहुत पानी बरसता है तो मिट्टी बैठ जाती है।
न रोया कर बहुत रोने से छाती बैठ जाती है।
यही मौसम था जब नंगे बदन छत पर टहलते थे,
यही मौसम है अब सीने में सर्दी बैठ जाती है।
नक़ाब उलटे हुए जब भी चमन से वह गुज़रता है,
समझ कर फूल उसके लब पे तितली बैठ जाती है।
~मुनव्वर राना
तक़्तीअ (2) –
बहुत पानी / बरसता है / (तो) मिट्टी बै / ठ जाती है
1222/ 1222 / 1222/ 1222
न रोया कर / बहुत रोने / (से) छाती बै / ठ जाती है
यही मौसम / (था) जब नंगे / बदन छत पर / टहलते थे
1222/ 1222/ 1222/ 1222
यही मौसम / (है) अब सीने / (में) सर्दी बैठ जाती है
1222/ 1222/ 1222/ 1222
नकाब उलटे / हुए जब भी / चमन से वह /गुज़रता है
1222/ 1222/ 1222/ 1222
(यहाँ नकाब उलटे को अलिफ वस्ल द्वारा न/का/बुल/टे 1222 माना गया है)
समझ कर फू / ल उसके लब / (पे) तितली बै / ठ जाती है
1222/ 1222/ 1222/ 1222
आज इतना ही,मिलते हैं अगले एपिसोड में तबतक के ले जय हिंद जय भारत।